वैर , अवैर
“न हि वैरेण वैराणि, शाम्यन्तीह कदाचन।
अवैरेण हि शाम्यन्ति, एष धर्मः सनातनः।। ”
अर्थ:
वैर (दुश्मनी) से वैर कभी समाप्त नहीं होता;
वैर केवल अवैर — यानी प्रेम, क्षमा और शांति से ही समाप्त होता है।
यही सनातन धर्म (सदैव सत्य रहने वाला नियम) है।
---
आज के जीवन में इसका महत्व
आज के समय में यह श्लोक पहले से भी अधिक प्रासंगिक है, क्योंकि जीवन के हर क्षेत्र — परिवार, कार्यस्थल, समाज और सोशल मीडिया — में मतभेद और विवाद आसानी से पैदा हो जाते हैं।
1. व्यक्तिगत जीवन में
यदि कोई व्यक्ति गुस्से में कुछ गलत कह दे और हम भी उसी तरह प्रतिक्रिया दें, तो विवाद बढ़ता ही जाता है।
लेकिन शांत व्यवहार और क्षमा रिश्तों को बचा लेते हैं।
👉 उदाहरण:
दो मित्रों में गलतफहमी हो जाए तो बहस से नहीं, बातचीत से समाधान निकलता है।
---
2. कार्यस्थल पर
ऑफिस या संस्था में मतभेद होना सामान्य है।
यदि हर व्यक्ति बदले की भावना से काम करे, तो वातावरण नकारात्मक हो जाता है।
लेकिन सहयोग और समझदारी से टीम मजबूत बनती है।
---
3. समाज में
हिंसा या नफरत से शांति कभी स्थापित नहीं हो सकती।
इतिहास और वर्तमान दोनों यह सिखाते हैं कि संवाद और करुणा ही स्थायी समाधान देते हैं।
---
मुख्य संदेश
यह श्लोक हमें सिखाता है कि —
क्षमा कमजोरी नहीं, सबसे बड़ी शक्ति है।
प्रेम और धैर्य से ही स्थायी शांति मिलती है।
नफरत को खत्म करने का एकमात्र तरीका नफरत नहीं, बल्कि सद्भाव है।

Comments