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न हि सर्वः सर्वं जानाति

Feb 9
3 min read

माननीय अध्यक्ष महोदय, मंचासीन आदरणीय महानुभाव, और मेरी जोशीली संस्था के उर्जावान साथियों,


आज मैं आप सबके बीच एक ऐसी चिंगारी लेकर आया हूँ, जो अगर दिल में उतर जाए तो हमारी संस्था की पूरी दिशा बदल सकती है। वह है यह प्रखर उक्ति –

**“न हि सर्वः सर्वं जानाति।”**

अर्थ – *कोई भी सब कुछ नहीं जानता, पर हर किसी के पास कुछ न कुछ अनमोल ज़रूर है।*


साथियो,

जिस दिन कोई व्यक्ति, कोई विभाग, कोई नेता यह सोच ले कि “अब तो मुझे सब पता है”, उसी दिन से उसका पतन शुरू हो जाता है। ठहरा हुआ पानी सड़ने लगता है, और ठहरा हुआ **विचार** भी संस्था को अंदर से खोखला कर देता है। हमारी संस्था को ठहरना नहीं है, हमें तो बहती धारा बनना है – जो हर मोड़ पर, हर चट्टान से टकराकर और अधिक **शक्तिशाली** होती चली जाए।


आज हमें यह मानना होगा –

हमारे ज्ञान से बड़ा हमारा *मिशन* है,

हमारी उपलब्धियों से बड़ा हमारा *लक्ष्य* है,

और हमारे पद से बड़ा हमारी *संस्था* का हित है।

इसलिए जो भी यहाँ बैठा है – चाहे वह प्रमुख हो, शिक्षक हो, कर्मचारी हो, स्वयंसेवक हो या विद्यार्थी – हर किसी के पास सीखने के लिए बहुत कुछ बाकी है, और सिखाने के लिए भी बहुत कुछ मौजूद है।


सोचिए साथियो,

कैसी होगी वह संस्था, जहाँ

- वरिष्ठ कहें – “मुझे युवाओं से नई सोच सीखनी है”,

- युवा कहें – “मुझे वरिष्ठों से अनुभव सीखना है”,

- शिक्षक कहें – “मुझे विद्यार्थियों से ताजगी और जिज्ञासा सीखनी है”,

- और विद्यार्थी कहें – “मुझे अपने गुरुजनों से अनुशासन और दिशा सीखनी है”!

ऐसी संस्था केवल संस्था नहीं रहती, **आंदोलन** बन जाती है।


“न हि सर्वः सर्वं जानाति” – यह वाक्य हमें झुकना नहीं, बल्कि सही दिशा में उठना सिखाता है।

यह कहता है –

- अहंकार तोड़ो,

- संवाद जोड़ो,

- गलती से डरो नहीं, गलती से सीखो,

- और हर दिन खुद से कहो – “आज मुझे कल से अधिक जानना है, अधिक करना है, अधिक देना है।”


मैं आप सबसे एक सीधी, जोशीली चुनौती रखना चाहता हूँ:

आज के बाद हमारी संस्था में

- कोई सुझाव दबाया नहीं जाएगा,

- कोई प्रश्न मज़ाक नहीं बनेगा,

- कोई नया विचार दुत्कारा नहीं जाएगा।

हम यह तय करेंगे कि हम सब मिलकर ऐसी *संस्कृति* बनाएँगे, जहाँ “मैं सब जानता हूँ” की जगह केवल एक स्वर गूँजे –

**“हम सब मिलकर सीखेंगे, हम सब मिलकर बढ़ेंगे!”**


आइए, अभी, इसी क्षण एक सामूहिक संकल्प करें –

अपने मन में, अपनी आत्मा में, अपनी संस्था की आत्मा में:


- मैं अपने पद से बड़ा सीखने को मानूँगा।

- मैं अपने अहंकार से बड़ा संगठन के हित को मानूँगा।

- मैं हर साथी में ज्ञान की एक किरण देखूँगा।

- और मैं हर दिन इस मंत्र को जीकर दिखाऊँगा –

**“न हि सर्वः सर्वं जानाति – पर हम सब मिलकर बहुत कुछ जान सकते हैं, बहुत कुछ कर सकते हैं!”**


उठिए साथियो,

अपने विचारों को, अपने संकल्पों को, अपनी संस्था की ऊर्जा को एक स्तर ऊपर उठाइए।

आज से हम ज्ञान के उपभोक्ता नहीं, ज्ञान के **युद्धा** बनेंगे –

जो हर दिन नई जानकारी, नई समझ, नई कार्यशीलता से अपनी संस्था को नई उड़ान देंगे।


**इसी ज्वाला के साथ,

हमारी संस्था के उज्ज्वल भविष्य के लिए –

जय हो हमारी संस्था की, जय हो ज्ञान की, जय हो सहयोग की!

धन्यवाद!**



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