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वैर , अवैर
“न हि वैरेण वैराणि, शाम्यन्तीह कदाचन। अवैरेण हि शाम्यन्ति, एष धर्मः सनातनः।। ” अर्थ: वैर (दुश्मनी) से वैर कभी समाप्त नहीं होता; वैर केवल अवैर — यानी प्रेम, क्षमा और शांति से ही समाप्त होता है। यही सनातन धर्म (सदैव सत्य रहने वाला नियम) है। --- आज के जीवन में इसका महत्व आज के समय में यह श्लोक पहले से भी अधिक प्रासंगिक है, क्योंकि जीवन के हर क्षेत्र — परिवार, कार्यस्थल, समाज और सोशल मीडिया — में मतभेद और विवाद आसानी से पैदा हो जाते हैं। 1. व्यक्तिगत जीवन में यदि कोई व्यक्ति गुस्
2 days ago1 min read
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