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सिख धर्म और आज की परिस्थितियाँ: एक समकालीन दृष्टि



आज का युग तेज़ बदलावों, प्रतिस्पर्धा और अस्थिरता का युग है। तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन साथ ही संवेदनशीलता, सहनशीलता और सामूहिकता को चुनौती भी दी है। ऐसे समय में सिख धर्म की शिक्षाएँ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक जीवन-पथ के रूप में सामने आती हैं।


सेवा: आज के स्वार्थी समय की सबसे बड़ी औषधि


आज समाज में “मैं” की भावना “हम” पर हावी होती जा रही है।

सिख धर्म की लंगर और सेवा परंपरा इस सोच को तोड़ती है।

बिना भेदभाव, बिना अपेक्षा—सेवा करना सिख धर्म का मूल है।

आज जब आपदाएँ, गरीबी और असमानता बढ़ रही हैं, तब यह परंपरा मानवता के लिए प्रेरणा बनती है।


समानता का विचार और सामाजिक तनाव


जाति, धर्म, वर्ग और लिंग के आधार पर भेदभाव आज भी एक सच्चाई है।

सिख धर्म स्पष्ट रूप से कहता है— सभी मनुष्य समान हैं।

गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु गोबिंद सिंह जी तक, सिख परंपरा ने समानता को केवल उपदेश नहीं, बल्कि आचरण बनाया।


अन्याय के विरुद्ध नैतिक साहस


आज अन्याय कई रूपों में मौजूद है—

कभी सत्ता के दुरुपयोग के रूप में, तो कभी सामाजिक चुप्पी के रूप में।

गुरु गोबिंद सिंह जी की “संत–सिपाही” की अवधारणा हमें सिखाती है कि

शांति का अर्थ कायरता नहीं, और साहस का अर्थ हिंसा नहीं होता।

अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना ही सच्चा धर्म है।


युवा पीढ़ी और सिख मूल्य


आज का युवा मानसिक दबाव, असुरक्षा और दिशाहीनता से जूझ रहा है।

सिख धर्म का जीवन-सूत्र—


नाम जपो (आत्म-संतुलन)


किरत करो (ईमानदार परिश्रम)


वंड छको (साझा जीवन)



युवाओं को उद्देश्य, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व सिखाता है।


वैश्विक परिप्रेक्ष्य में सिख धर्म


आज जब विश्व संघर्ष, असहिष्णुता और विभाजन का सामना कर रहा है,

सिख धर्म का संदेश—“सरबत दा भला”—

पूरे मानव समाज के कल्याण की बात करता है।

यह संदेश सीमाओं से परे, पूरी मानवता को जोड़ने वाला है।


निष्कर्ष


आज की परिस्थितियाँ यह मांग करती हैं कि धर्म को केवल पहचान न बनाकर

जीवन का आचरण बनाया जाए।

सिख धर्म हमें सिखाता है— सत्य बोलना, निडर रहना और सेवा को जीवन का उद्देश्य बनाना।


यही मूल्य आज के समय में समाज को दिशा और मानवता को आशा दे सकते हैं।



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