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संस्था स्तर पर संविधान का महत्व, राम राज्य की अवधारणा, तथा संस्था प्रमुख एवं कर्मचारियों की भूमिका

माननीय मंचासीन अतिथिगण,

आदरणीय संस्था प्रमुख,

कर्मठ कर्मचारीगण

एवं मेरे प्रिय साथियो,


आज मैं भाषण की शुरुआत दो श्लोकों से करूंगा :

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1- “वसुधैव कुटुम्बकम्”

2- “धर्मेण राज्यं पालयेत्”


वसुधैव कुटुम्बकम्' का अर्थ है "धरती ही परिवार है" (वसुधा + एव + कुटुम्बकम्), जो भारतीय संस्कृति का एक प्राचीन दर्शन है। यह महा उपनिषद और अन्य ग्रंथों से आया है, जो संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानकर प्रेम, भाईचारे और समानता का संदेश देता है। यह भारतीय विदेश नीति और विश्व दृष्टि का आधार है, जो संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठकर वैश्विक एकता पर जोर देता है।


धर्मेण राज्यं पालयेत्" का अर्थ है- 'राजा (शासक) को धर्म (कर्तव्य, न्याय, विधि) के अनुसार राज्य का पालन (शासन) करना चाहिए'। यह संस्कृत उक्ति प्राचीन राजधर्म का मूलमंत्र है, जो बताती है कि सत्ता का उद्देश्य केवल शासन करना नहीं, बल्कि प्रजा की रक्षा, न्याय और उनके कल्याण के लिए नैतिक नियमों का पालन करना है।




साथियो,

संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि हमारे विचार, व्यवहार और व्यवस्था की आत्मा है।

जिस प्रकार राष्ट्र के संचालन के लिए संविधान आवश्यक है, उसी प्रकार हर संस्था के सुचारु, न्यायपूर्ण और पारदर्शी संचालन के लिए संवैधानिक मूल्यों की आवश्यकता होती है।


संविधान हमें सिखाता है—

न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व।

जब ये मूल्य किसी संस्था की कार्यसंस्कृति बन जाते हैं, तब वह संस्था केवल कार्यस्थल नहीं रहती, बल्कि एक आदर्श परिवार और सशक्त राष्ट्र की इकाई बन जाती है।


अब यदि हम राम राज्य की बात करें—

राम राज्य का अर्थ केवल एक ऐतिहासिक काल नहीं,

बल्कि एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ—


शासक उत्तरदायी हो


व्यवस्था न्यायपूर्ण हो


निर्णय धर्म और नीति पर आधारित हों


और सबसे कमजोर व्यक्ति भी स्वयं को सुरक्षित महसूस करे



राम राज्य में राजा स्वयं को सेवक मानता था।

यही भावना आज संस्था प्रमुख के लिए भी आदर्श है।


आदरणीय साथियो,

संस्था प्रमुख की भूमिका केवल आदेश देने तक सीमित नहीं होती।

वे संस्था की आत्मा, दिशा और दृष्टि होते हैं।

उनका आचरण ही कर्मचारियों का आचरण बनता है,

उनका निर्णय ही संस्था की पहचान बनता है।


संस्था प्रमुख यदि—


संविधान के मूल्यों का सम्मान करे


निष्पक्षता और पारदर्शिता अपनाए


संवाद और संवेदनशीलता को महत्व दे



तो पूरी संस्था स्वतः ही राम राज्य की भावना को जीने लगती है।


वहीं दूसरी ओर,

कर्मचारी किसी भी संस्था की रीढ़ होते हैं।

उनकी निष्ठा, ईमानदारी और कर्तव्यबोध ही संस्था को ऊँचाइयों तक ले जाता है।


कर्मचारियों की भूमिका है—


नियमों का पालन करना


अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों को समझना


संस्था की प्रतिष्ठा को अपना सम्मान मानना



जब कर्मचारी “मैं” से ऊपर “हम” को रखते हैं,

तब संस्था केवल सफल नहीं, बल्कि आदर्श बनती है।


साथियो,

संविधान हमें अधिकार देता है,

लेकिन राम राज्य हमें उत्तरदायित्व का बोध कराता है।

इन दोनों का समन्वय ही किसी भी संस्था को सशक्त, संवेदनशील और स्थायी बनाता है।


आइए, हम संकल्प लें—


संविधान के मूल्यों को केवल पढ़ेंगे नहीं, जीएँगे


राम राज्य की भावना को केवल भाषणों में नहीं, व्यवहार में उतारेंगे


और अपनी संस्था को न्याय, नैतिकता और राष्ट्र निर्माण की प्रयोगशाला बनाएँगे



इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।


जय संविधान!

जय भारत!

जय संस्था!🇮🇳✨



 
 
 

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