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Google's Project Suncatcher

**गूगल का प्रोजेक्ट सनकैचर: एक व्यापक अवलोकन (TPU की अंतरिक्ष चुनौतियाँ और थर्मल मैनेजमेंट सहित)**


नवंबर 2025 में गूगल ने **प्रोजेक्ट सनकैचर** नामक एक क्रांतिकारी रिसर्च मूनशॉट की घोषणा की। यह प्रोजेक्ट आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की तेजी से बढ़ती कम्प्यूटिंग और ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अंतरिक्ष को एक नया प्लेटफॉर्म बनाने का प्रयास है। पृथ्वी पर AI ट्रेनिंग और इन्फ्रेंस के लिए बिजली की भारी मांग डेटा सेंटर्स को ग्रिड पर दबाव डाल रही है, पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है। सनकैचर का मूल विचार है कि **सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट** (दिन-रात वाली कक्षा जहां सूर्य हमेशा दिखाई देता है) में सोलर-पावर्ड सैटेलाइट्स पर गूगल के कस्टम **Tensor Processing Units (TPUs)** लगाकर AI कंप्यूटेशन किया जाए। यहां सोलर पैनल पृथ्वी की तुलना में 8 गुना ज्यादा कुशल होते हैं—कोई बादल, कोई रात, कोई वायुमंडल नहीं। इससे असीमित साफ ऊर्जा मिलती है, बिना पृथ्वी के संसाधनों पर बोझ डाले।


प्रोजेक्ट का डिजाइन मॉड्यूलर और स्केलेबल है। छोटे-छोटे सैटेलाइट्स के क्लस्टर बनाए जाते हैं, जो एक-दूसरे से 100-200 मीटर दूरी पर उड़ते हुए लगभग 1 किलोमीटर के दायरे में रहते हैं। एक उदाहरण क्लस्टर में करीब 81 सैटेलाइट्स हो सकते हैं। इनके बीच हाई-बैंडविड्थ कम्युनिकेशन **फ्री-स्पेस ऑप्टिकल लिंक्स** (लेजर बीम) से होता है। लैब टेस्ट में एक ट्रांससीवर जोड़ी से 1.6 टेराबिट्स प्रति सेकंड की स्पीड हासिल की गई है। सैटेलाइट्स गूगल के **Trillium TPU (v6e)** चिप्स से लैस होंगे, जो AI वर्कलोड के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए हैं।


प्रोजेक्ट अभी शुरुआती रिसर्च स्टेज में है। गूगल ने **प्लैनेट लैब्स** के साथ पार्टनरशिप की है। वे दो प्रोटोटाइप सैटेलाइट्स (प्लैनेट के Owl प्लेटफॉर्म पर आधारित, बड़े सोलर पैनल के साथ) बनाकर लॉन्च करेंगे। पहला डेमो लॉन्च **अर्ली 2027** में लक्षित है। ये सैटेलाइट्स TPUs की अंतरिक्ष में परफॉर्मेंस, रेडिएशन प्रभाव, थर्मल साइक्लिंग और ऑप्टिकल लिंक्स को टेस्ट करेंगे। गूगल की पेपर "Towards a future space-based, highly scalable AI infrastructure system design" (arXiv:2511.19468) में विस्तार से आर्किटेक्चर, चुनौतियाँ और प्रोग्रेस बताया गया है।


**TPU की अंतरिक्ष चुनौतियाँ**

अंतरिक्ष का वातावरण TPUs के लिए बहुत कठोर है, क्योंकि ये चिप्स मूल रूप से ग्राउंड-बेस्ड क्लाउड डेटा सेंटर्स के लिए बने हैं। मुख्य चुनौतियाँ निम्न हैं:


1. **रेडिएशन टॉलरेंस**

लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में कॉस्मिक रेज़, सोलर फ्लेयर्स और प्रोटॉन/इलेक्ट्रॉन से **टोटल आयोनाइजिंग डोज़ (TID)** और **सिंगल इवेंट इफेक्ट्स (SEEs)** होते हैं। ये बिट-फ्लिप एरर्स, डेटा करप्शन या परमानेंट डैमेज का कारण बन सकते हैं।

गूगल ने Trillium TPU को 67 MeV प्रोटॉन बीम में टेस्ट किया। परिणाम आश्चर्यजनक रूप से अच्छे थे:

- **High Bandwidth Memory (HBM)** सबसे संवेदनशील हिस्सा था, लेकिन अनियमितताएँ 2 krad(Si) डोज़ के बाद शुरू हुईं—जो 5 साल के मिशन के अनुमानित 750 rad(Si) से 3 गुना ज्यादा है।

- 15 krad(Si) तक कोई हार्ड फेलियर नहीं।

SEEs से HBM में ECC एरर्स होते हैं, लेकिन ECC और सॉफ्टवेयर मिटिगेशन से हैंडल किया जा सकता है। सोलर स्टॉर्म्स के दौरान अतिरिक्त शील्डिंग की जरूरत पड़ सकती है।


2. **थर्मल मैनेजमेंट**

TPUs हाई-पावर डेंसिटी वाले होते हैं और बहुत गर्मी पैदा करते हैं। वैक्यूम में कोई कन्वेक्शन नहीं, इसलिए केवल रेडिएटिव कूलिंग संभव है। टेम्परेचर स्विंग्स बड़े होते हैं—सूर्य की तरफ गर्मी ज्यादा, छाया में ठंड।


3. **ऑन-ऑर्बिट रिलायबिलिटी**

अंतरिक्ष में रिपेयर असंभव। लॉन्च वाइब्रेशन, थर्मल साइक्लिंग, माइक्रोमेटियोरॉइड/ऑर्बिटल डेब्री से खतरा। मॉड्यूलर क्लस्टर से रिडंडेंसी मिलती है, लेकिन लंबे समय तक बिना फेलियर के चलना चुनौतीपूर्ण।


4. **अन्य चुनौतियाँ**

- हाई-बैंडविड्थ ग्राउंड कम्युनिकेशन में विलंब।

- क्लस्टर में सटीक फॉर्मेशन फ्लाइट।

- लागत और स्केलिंग—व्यावसायिक स्तर पर दशक लग सकते हैं।


**थर्मल मैनेजमेंट के समाधान**

थर्मल मैनेजमेंट सबसे जटिल चुनौतियों में से एक है। गूगल की रिसर्च और पेपर के अनुसार, निम्न समाधान अपनाए जा रहे हैं:


1. **हीट पाइप्स और एडवांस्ड थर्मल इंटरफेस मटेरियल्स (TIMs)**

TPU से गर्मी को पैसिव तरीके से दूर ले जाने के लिए **हीट पाइप्स** इस्तेमाल होंगे। ये फेज चेंज (तरल से गैस) पर आधारित होते हैं—कोई मूविंग पार्ट्स नहीं, इसलिए रिलायबिलिटी ज्यादा।

**एडवांस्ड TIMs** (ग्राफीन-बेस्ड या नैनो कंपोजिट) चिप और हीट स्प्रेडर के बीच थर्मल रेसिस्टेंस कम करते हैं। पेपर में कहा गया है कि "advanced thermal interface materials and heat transport mechanisms, preferably passive to maximize reliability" बड़े हीट लोड को चिप्स से रेडिएटर तक पहुंचाएंगे।


2. **डेडिकेटेड रेडिएटर्स**

गर्मी को अंतरिक्ष के ठंडे वैक्यूम में छोड़ने के लिए बड़े **रेडिएटर्स** लगाए जाएंगे। ये हाई-एमिसिविटी मटेरियल से बने होते हैं जो इन्फ्रारेड रेडिएशन से गर्मी फेंकते हैं।

सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में ठंडी साइड पर रेडिएटर्स रखे जा सकते हैं। डिप्लॉयेबल (खुलने वाले) या बिफेशियल रेडिएटर्स से सरफेस एरिया बढ़ाया जा सकता है, मास कम रखते हुए।


3. **पैसिव और एक्टिव कंट्रोल**

- पैसिव डिज़ाइन प्राथमिकता: कोई मूविंग पार्ट्स नहीं।

- थर्मल स्विच, वेरिएबल एमिसिविटी कोटिंग्स या लाउवर सिस्टम से टेम्परेचर नियंत्रित।

- गीगावाट-स्केल के लिए रेडिकल इंटीग्रेशन: सोलर पावर, कंप्यूट और थर्मल मैनेजमेंट को एक साथ डिज़ाइन करना, ताकि कुशलता बढ़े।


4. **प्रोटोटाइप में टेस्टिंग**

2027 के दो प्रोटोटाइप सैटेलाइट्स रियल ऑर्बिट में थर्मल साइक्लिंग, वैक्यूम कंडीशंस और TPU हीट जनरेशन को मॉनिटर करेंगे। शुरुआती सिमुलेशन से पता चला है कि रेडिएटिव कूलिंग संभव है, लेकिन AI-लेवल पावर के लिए ऑप्टिमाइजेशन जरूरी।


**समग्र प्रभाव और भविष्य**

प्रोजेक्ट सनकैचर गूगल की मूनशॉट परंपरा (जैसे Waymo, Loon) का हिस्सा है। अगर सफल हुआ, तो अंतरिक्ष में "फ्लोटिंग डेटा सेंटर्स" AI की ग्रोथ को नई दिशा दे सकते हैं—ऊर्जा संकट से निपटते हुए। रेडिएशन में TPU अच्छा परफॉर्म कर रहे हैं, लेकिन थर्मल और रिलायबिलिटी अभी बड़ी बाधाएँ हैं। इंजीनियरिंग हर्डल्स के बावजूद, 2027 का डेमो मिशन इन समाधानों की वैलिडेशन करेगा। यह AI, स्पेस टेक्नोलॉजी और सस्टेनेबल एनर्जी का रोमांचक संगम है, जो भविष्य की कंप्यूटिंग को बदल सकता है।



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