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रूप नहीं, गुण ही पहचान हैं

Feb 27
1 min read

> आदरणीय प्राचार्य महोदय, सम्मानित अध्यापकगण, और मेरे प्रिय साथियो — नमस्कार।

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> आज मैं एक अत्यंत सुंदर संस्कृत सुभाषित पर अपने विचार प्रस्तुत करना चाहता हूँ —

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> **“काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयोः।

> सम्प्राप्ते वसन्तकाले काकः काकः पिकः पिकः॥”**

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> यह सुभाषित हमें एक गहरी जीवन-सत्य की ओर ले जाता है। कौआ और कोयल — दोनों काले रंग के होते हैं। देखने में कोई अंतर नहीं। पर जब वसंत आता है, तो कोयल का मधुर गान सबके मन को मोह लेता है, और कौए की कर्कश ध्वनि अप्रिय लगती है। उस समय सबको स्पष्ट दिख जाता है कि कोकिल कोकिल है और कौआ कौआ।

>

> यही जीवन का बड़ा संदेश है — मनुष्य की पहचान उसके **रूप-रंग से नहीं**, बल्कि **वाणी, व्यवहार और गुणों** से होती है। जैसा कि नीति कहती है — सुन्दर वाणी सोने से भी अधिक मूल्यवान होती है।

>

> आज के युग में, जब लोग बाहरी आकर्षण और दिखावे की दौड़ में लगे हैं, तब यह सुभाषित हमें स्मरण कराता है कि सच्चा सौंदर्य भीतर के संस्कारों और मधुरता में होता है।

>

> यदि हमारी वाणी कोयल की तरह मीठी हो, हमारे आचरण में विनम्रता और सच्चाई हो, तो संसार स्वयं हमें पहचान लेगा — ठीक वैसे ही जैसे वसंत में कोयल का गीत सबके दिल में बस जाता है।

>

> अतः आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम अपने जीवन में **रूप नहीं, बल्कि गुणों से पहचान बनाने वाले बने**।

>

> धन्यवाद। जय हिन्द।


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