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“दिल से जो बात निकलती है असर रखती है, पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़, मगर रखती है।”

  • Mar 9
  • 3 min read

सम्मानित प्राचार्य महोदय, आदरणीय गुरुगण और मेरे प्यारे साथियो,


आज मैं अपनी बात एक बहुत ही मशहूर और रूहनियत से भरपूर शेर से शुरू करना चाहता हूँ, जो अल्लामा इक़बाल ने कहा है:


“दिल से जो बात निकलती है असर रखती है,

पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़, मगर रखती है।”


इस एक छोटे से शेर में ज़िन्दगी की बहुत बड़ी सच्चाई छुपी हुई है।

इसका मतलब है – जो बात हमारे दिल की गहराई से निकलती है, जो बात सच्चाई, इख़लास यानी ईमानदारी और साफ़ नीयत से निकलती है, वो ज़रूर असर डालती है।

शायद उसके पास ‘परवाज़’ की ताक़त न हो – यानी उसके पीछे कोई बड़ा मंच न हो, बड़ी पदवी न हो, बड़ी दौलत या शोहरत न हो – फिर भी वो बात अपनी मंज़िल तक पहुँच जाती है, लोगों के दिलों तक दस्तक दे ही देती है।


साथियो, हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में भी हम यह बात महसूस करते हैं।

किसी टीचर की डाँट भी हमें बुरी नहीं लगती, अगर हमें यक़ीन हो कि वो हमारे भले के लिए, दिल से कह रहे हैं।

किसी दोस्त की छोटी-सी तसल्ली, एक सादा-सा “तुम कर लोगे” – यह भी हमें नई हिम्मत दे देता है, क्योंकि वह बात उसके दिल से निकली होती है।

इसके बरअक्स, बड़ी-बड़ी बातें, बहुत भारी-भरकम जुमले, अगर सिर्फ़ दिखावे के लिए हों, तो कुछ देर शोर तो मचा देते हैं, मगर गहरा असर नहीं छोड़ पाते।


अल्लामा इक़बाल का यह शेर हमें तीन–चार अहम बातें सिखाता है:


- पहली बात: **नीयत** की पाकीज़गी

अगर हमारी नीयत साफ़ है, हम सच में मेहनत करना चाहते हैं, सच में अच्छा इंसान बनना चाहते हैं, तो हमारी हर कोशिश, हर दुआ, हर कदम का असर ज़रूर होगा।

हो सकता है नतीजा तुरंत न दिखे, मगर धीरे–धीरे वही सच्ची कोशिश हमारी पहचान बन जाती है।


- दूसरी बात: दिखावे से ज़्यादा दिल की सच्चाई

आज के दौर में अक्सर हम बाहर की चमक–दमक में उलझ जाते हैं – अच्छी ड्रेस, अच्छा मोबाईल, स्टाइलिश लैंग्वेज।

लेकिन असल में लोगों के दिल पर जो चीज़ असर करती है, वह है हमारा किरदार, हमारा अख़लाक – हम कितने सच्चे हैं, कितने भरोसेमंद हैं, और दूसरों के लिए दिल से कितना सोचते हैं।


- तीसरी बात: दिल से की गई मेहनत कभी ज़ाया नहीं जाती

जब हम पढ़ाई “बस पास होने” के लिए नहीं, बल्कि सच में सीखने के इरादे से करते हैं, तो किताबों के अल्फ़ाज़, टीचर्स की हिदायतें हमारे अंदर उतर जाती हैं।

यही दिल से की गई मेहनत आगे चलकर हमारे करियर, हमारी सफलता और हमारी शख्सियत की बुनियाद बनती है।


साथियो, अल्लामा इक़बाल ने सिर्फ़ शेर नहीं कहा, उन्होंने एक उसूल दिया –

कि अपने लफ़्ज़, अपनी सोच और अपनी दुआओँ को दिल से निकलने दो।

जब हम अपने माता–पिता का शुक्रिया दिल से अदा करते हैं, तो कुछ बदले में माँगने की ज़रूरत नहीं पड़ती; उनकी दुआएँ अपने आप हमारी राहों को आसान बना देती हैं।

जब हम अपने गुरुओं का सम्मान दिल से करते हैं, तो उनकी बातों में ऐसी बरकत आती है जो हमारी पूरी ज़िन्दगी को संवार सकती है।


आज की इस सभा में, मैं आप सब से, और ख़ास तौर पर अपने साथी छात्रों से यह गुज़ारिश करना चाहता हूँ कि:


- जब भी कुछ बोलो – सच्चाई से बोलो।

- जब भी किसी की मदद करो – दिखावे के लिए नहीं, बल्कि इंसानियत के लिए करो।

- जब भी कोई सपना देखो – सिर्फ़ सोने के लिए नहीं, बल्कि जागकर मेहनत करने के इरादे से देखो।


क्योंकि जो बात, जो दुआ, जो ख्वाहिश, जो इरादा सच्चे दिल से निकलता है,

वो शायद देर से सही, मगर असर ज़रूर दिखाता है।

शायद उसके पास “ताक़त-ए-परवाज़” न हो, लेकिन उसकी रोशनी आसमान तक ज़रूर पहुँचती है।


आइए, आज हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि

हम अपनी ज़ुबान को सच्चा रखेंगे,

अपनी नीयत को साफ़ रखेंगे,

और अपने दिल को इतना बड़ा बनाएँगे कि उसमें खुद के लिए भी मोहब्बत हो और दूसरों के लिए भी रहमत हो।


यही अल्लामा इक़बाल के इस शेर का असल पैग़ाम है –

दिल से निकली बात, दिल तक पहुँचती है।


धन्यवाद।


***



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